नन्हा सा गुज़रता ख्याल


कभी टेढ़े मेधे रास्तों पर ,
जब सूख सी जाती थी  एड़ियां .
माथे पर आ जाती,
जब  लकीरें  मायूसी की .

बालों को सहलाता एक हाथ ,
और हंसा दे  ,कुछ ऐसी बात .
दो आँखें जो कह देती ,
“क्या है ग़म जब मैं हूँ साथ “.

आज सिर्फ एक आवाज़ है गूंजती ,
जो कहती तोह कुछ वैसा ही है .
उम्मीद नहीं है अब उस हाथ की ,
और ना ही ज़रूरत है .
हमेशा तोह सांसें भी साथ  नहीं  देती .

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